शनिवार, 27 जुलाई 2019

हमारी शिक्षा और हमारा समाज


हमारी शिक्षा और हमारा समाज

वर्तमान परिवेश में शिक्षा को लेकर हम और हमारा समाज जंहा खड़ा है वह हमारे शिक्षा के स्वरुप का ही देन है| हम, हमारा समाज और देश आज तेजी के साथ विकास अवश्य कर रहा है पर हम इस विकास के यात्रा में शिक्षा के स्वरुप और वर्तमान ब्यवस्था के कारण उस विकास की यात्रा में साथ नहीं चल पा रहे है, हमें खास कर शिक्षित  युवा को जन्हा होना चाहिए| इसका मूल कारण हमारी शिक्षा का अ-ब्यवस्था और सही तरीके से प्रबंधन ना होना है| यह सच ही की आज का युवा शिक्षित हो रहा है पर वह शिक्षा मात्र डिग्री पाने तक ही समिति है| जिसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव समाज में कई रूपों में पड़ रहा है जिसमे से एक सबसे कारण बेरोजगारी है जिसका राजीनीतिकारन भी खूब हो रहा है जो समाज में एक राजनीति के लिए एक मोहरा बन चुका है| इसके अतिरिक्त बहुत सारे दूसरे कारण भी है जो प्रत्क्ष्य या अप्रतक्ष्य रूप से समाज को प्रभावित कर रहे है| समाज में संस्कार, ब्यवहार और शालीनता को भी वर्तमान शिक्षा ने  ही कही ना कही और किसी ना किसी रूप में प्रभावित किया है| हमारे  समाज में आज चोरी, डकैती, उग्रवाद, और आंतकवाद बड़ी ही तेजी से बढ़ रहा है जिसमे भी वर्तमान शिक्षा की ब्यावस्था और उपयोगिता की भी कही ना कही भूमिका है| शिक्षा के नयी व्यवस्था और  परिवर्तन का जितना प्रभाव समाज में और खासकर देश के युवा में दिखना औरपड़ना पढ़ना चाहिए था वह कही भी दिखाई नहीं देता| इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि शिक्षा के स्वरुप और ब्यावस्था में परिवर्तन नहीं हुए पर उसका प्रभाव जितना समाज में मिलना चाहिए वह वर्तमान शिक्षा के स्वरुप और ब्यावस्था के परिवर्तन से प्राप्त नहीं हो रहे है| इसके बहुत  से कारण हो सकते है| एक सामाजिक विचारक,लेखक और चिन्तक के रूप में कुछ कारणों पर प्रकाश डालना एक  सुझाव है| आज समाज- देश में आधुनिकरण और मशीनीकरण के साथ डिजिटलीकरण का परिवर्तन बड़ी तेजी से हो रहे है इसी के साथ साथ देश में शिक्षा को भी तेजी से बदला जा रहा है पर यह पूर्णत: पर्याप्त और असफल प्रतीत हो रहा है जिसका सबसे बड़ा उदाहरण शिक्षित युवा बेरोजगार का देश में बढ़ना है| देश में शिक्षा के स्वरुप और ब्यावस्था का सही रूप से परिवर्तन नहीं करना है, देश में केवल डिग्री दी जा रही और तेजी  के साथ बेसिक शिक्षा से लेकर डिग्री स्तर और तकनीकी व् मेडिकल शिक्षा का प्रसार और बढ़ावा दिया जा रहा है पर उसके गुणवत्ता और उपयोगिता पर कभी परिचर्चा और बहस समाज नहीं करना चाहता है| जिसका कारण है हमारा युवा शिक्षित होते हुए भी बेरोजगार और बेकार है| ऐसा भी नहीं है की देश में नौकरी और स्वरोजगार या नया तरीके जीवन यापन करने के लिए उपलब्ध नहीं है या फिर हमारा युवा कर नहीं सकता है| पर उसके लिए समुचित परिवेश और सन-संधानो की कमी और जानकारी का अभाव है| वर्तमान शिक्षा स्वरुप और ब्यावस्था में बेसिक से डिग्री तक के शिक्षा में  ४०-५०% कोर्से सैलबस के अनुरूप और अनुपुक्त है,या उस कोर्से से सम्बंधित या उसकी उपयोगिता नहीं के बराबर है| इस विषय पर गंभीर रूपसे  चिंतन किये जाने की आवश्यकता है| कोर्से के निर्धारण में सामाजिक, सभ्यता और संस्कार का पूर्णरूप से अभाव है किसी भी कोर्से में सामाजिक जीवन की उपयोगिता, सामाजिक ब्यवहार और राष्ट्रवाद का अभाव है| हमने जिस तेजी के साथ बेसिक शिक्षा से लेकर डिग्री स्तर के कोर्से में परिवर्तन किया उसमे आधुनिकरण और अंग्रेजी ने उन सभी विषयो को काफी पीछे छोड़ दिया जो सामाजिक विकास का मूलमंत्र थे| हम यदि अपने गुरुकुल के शिक्षा के स्वरुप को देखे तो हम यह पायंगे की सामाजिक जीवन की उपयोगिता, सामाजिक ब्यवहार और राष्ट्रवाद के लिए उन पाठ्यकर्म में आज से कही ज्यादा परिणाम मिलते थे| हम आज जिस तकनिकी और प्रबंधन के विकास के लिए पाठ्कर्मो को परिवर्तित्त करना चाह रहे है, उसके लिए यदि हम अपने पौराणिक ग्रन्थ जैसे रामायण और गीता में लिखे विषयो का गहन अध्यन  और विचार करे तो उससे कही ज्यादा जानकारी पा सकते है और सीख सकते है जिसका परिणाम हमें ब्यावारिक रूप से भी देखने और समझाने को मिल सकता है| किसी भी समाज के विकास के लिए संयम, अनुशाशन और समय पालन सबसे बड़ा मूल मंत्र है आज भी हम जब किसी बड़े विकसित संस्थान को देखे तो संयम, अनुशाशन और समय पालन ही उसका सनसे बड़ा मूलमंत्र है| उस विकसित संस्थान में संस्थान के लिए क्रमश: समय पालन के लिए बायोमेट्रिक हाजिरी लगाई जा रही है, सभी कार्य ऑनलाइन सुचना के माध्यम से किये जा रहे जो संयम  बताता है तथा सूचनाओ को बारी - बारी से मिलना और क्रमवार चलना हमें अनुशाशन बनाये रखने के लिए बाध्य कर रहा है| इस सभी कार्यों में हम स्वत: संस्कार और ब्यवहार में भी डाल सकते है| आज आधुनिकरण या ऑनलाइन प्रक्रिया सफलता के लिए बनायी जा रही है वह हमारे गुरुकुल शिक्षा के ही स्वरुप की देन है जो आधुनिक और परिवर्तित होकर विकास के नए द्वार खोल रहा है इस सभी प्रक्रिया में अपराध और घुशखोरी में निशिचित ही रोक लग रहा है|


आज समाज में शिक्षा और शिक्षा के विकास के साथ उसकी उपयोगिता के बारे में फिर से और नए रूप से बदलाव किये जाने की जरुरत है| जिसमे सबसे पहला शिक्षा सभी के लिए अनिवार्य बने, शिक्षा का सरलीकरण किया जाय, शिक्षा में व्यहारिकता और संस्कार का प्रधुर्भाव बनाया जाय, शिक्षा के कई स्तर निर्धारित किये जाय, बेसिक शिक्षा के बाद छात्र को विषय विशेष शिक्षा के चुनाव किये जाने हेतु उसके मानसिक, बौद्धिक और मनस्थिति का मनोवैज्ञानिक रूप से टेस्ट करने के बाद ही विषय विशेष का चुनाव का अधिकार दिया जाना उचित होगा इससे एक तरफ जन्हा बिना किसी उद्देश्य और कार्य के लिए दी जा रही डिग्री के शिक्षा खर्च की बचत होगी दूसरी तरफ सही ब्यक्ति सही शिक्षा के चुनाव के साथ बेहतर से बेहतर परिणाम देश के विकास में देगा|
आज समाज और देश में एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाए जानी चाहिए जिसमे युवा को उसके मानसिक, शारीरिक और इक्षाशक्ति के समावेश के साथ सामाजिक जीवन की उपयोगिता, सामाजिक ब्यवहार और राष्ट्रवाद का समावेश हो, युवा सिर्फ शिक्षा पाकर सरकारी नौकरी/रोजगार की इच्छा ना रख्खे बल्कि वह दूसरों को नौकरी/रोजगार देने की बात सोचे और एक दूसरे से कंधा से कंधा मिलाकर समाज, देश और राष्ट्र निर्माण की बात सोचे| शिक्षा के स्वरुप को ऐसे निर्माण किये जाने की आवश्यकता है जिसके पाठ्यक्रमों में महापुरषो और मार्गदर्शको के चरित्र और विचारों की समावेश ब्यवहारिक रूप से मिले सिर्फ उन्हें कंथाकन और परिचय के लिए ना रख्खे जाय| हम राम और कृष्ण जैसे अन्य के कथानक और चरित्र को पढकर उनके संस्कारो और व्याहारिक कार्यों का उपयोग एक शिक्षित सामाजिक विकास में कर सकते है| आज का युवा शिक्षित होकर समरसता, सम्मान और स्वाभिमान को  भूलकर एकाकी, अनादर और अभिमान को अपना रहा है|
समाज और देश को शिक्षा को विकास का माध्यम बनाना होगा| हम शिक्षा को बेसिक स्तर से ही कैटेगोरी कर के आगे बढ़ाना चाहिए जिससे हमें बच्चे के बेसिक स्तर की शिक्षा देते समय ही यह तय करना होगा की कौन सा बच्चा अपनी रूचि अनुसार किस क्षेत्र में जा सकता है, उसे उसी तरह के विषय तय करने का अवसर मिले जिससे वह प्रारम्भ से ही अपने रूचि अनुसार विषय विशेष की उच्च शिक्षा का कोर्से चुनकर अपने भविष्य और कैरिएर के आगे बढ़ सके| इससे समय और शिक्षा का ब्यर्थ खर्च दोनों में बचत हो सकेगी| हमें इसके नुकशान का रूप ऐसे देखने को मिल सकता है कि एक छात्र तकनिकी और मेडिकल की शिक्षा का विशेष विषय महारथी होने के गुणों का फायदा ना तो उसे मिल पाता है ना समाज या देश को, जब वही छात्र देश के प्रशाशनिक  या अपने विषय विशेषमें  महारथ रखने  से अलग कैरिएर का चुनाव कर लेता है| आज समाज में यह अक्सर देखने को मिल सकता है कि यदि किसी संस्था या प्रतिष्ठान में चपरासी की पद है तो उस पर उस पद से ज्यादा योग्यता रखने वाले आवेदक की भीड़ लग जाती है| यह हमारे समाज और शिक्षा दोनों के लिए अपमान जनक है|  हम कैसे शिक्षा का निर्माण कर रहे है| शिक्षा की व्यवस्था में भी केटेगरी किया जाना चाहिए और शिक्षित होने के लिए एक नुय्नतम / अधिकतम सीमा बने| जिससे हर स्तर पर बनी शिक्षा का महत्व बना रहे|
इस दिशा में सरकार को यह तय करना चाहिय्र कि हमें किस स्तर पर कितने शिक्षित युवा की जरुरत रहेगी| जैसे हमें कितने वैज्ञानिक, कितने इंजीनियर, कितने डाक्टर और वकील या अन्य किसी विषय विशेष के ब्यक्तियो की समाज और देश की व्यव्श्था को चलाने के लिए जरूररत है| उस तय सीमा के आवश्यकता अनुसार ही शिक्षा को केटेगरी बनाकर उच्च शिक्षा की संस्थान खोले जाय| जिससे छात्र और युवा के बीच स्पर्धा बन सके और विषय विशेष का प्रवेश छात्र के योग्यता अनुसार उसे मिल सके| जिसमे वह सफल होकर अपनी योग्यता का सम्पूर्ण समाज और देश को दे सके|
समाज में शिक्षा का अधिकार सभी को मिले इसके लिए एक नुय्नतम पाठ्यक्रम निर्धारित हो जिसमे सबसे पहले जिस विषय का ज्ञान अनिवार्य हो वह सामाजिक जीवन की उपयोगिता, सामाजिक ब्यवहार और राष्ट्रवाद के साथ पढने, लिखने के साथ अच्छे – बुरे कर्मो का ज्ञान, आपसी प्रेम समरसता और जन-सम्मान की भावना विकसित किये जाने का जानकारी निहित हो| एक निश्चित समय अविधि और शिक्षा का ज्ञान दिए जाने के बाद उसके मानसिक, शारीरिक और बौद्धिक ज्ञान अनुसार उसे आगे के विषय विशेष की पढाए जाने के चुनाव का अवसर एक चुनाव प्रक्रिया द्वारा जितनी समाज देश को जरुरत के संख्या के आधार पर दी जानी चाहिए इसमे किसी प्रकार के अपवाद नहीं है क्योकि जब हम आई०  ए०  एस० और पी० सी० एस० जैसे परीक्षा का आयोजन एक सिमित संख्या को देखकर करते है तो फिर हमें इस व्यव्स्था को उच्च शिक्षा या विषय विशेष में क्यों नहीं कर सकते है, इस व्यवस्था से किसी भी छात्र के समय और पैसे दोनों की बचत होगी और देश को जन्हा एक विशेष गुणों वाले विषय विशेष के विशेषज्ञ मिलेंगे वही दूसरे तरफ रोजगार के साधन और चुनाव शिक्षा की योग्यता अनुसार निर्धारण बन सकेगा| हम समाज में ढेर सारे इंजीनियर, डाक्टर, वकील या अन्य विषय विशेषज्ञ बना कर क्या करंगे जब हम उन्हें उनके  योग्यता के अनुसार रोजगार के अवसर समाज के विकास में भागीदार नहीं बना पायंगे| यदि एक डाक्टर या इंजीनयर अपनी योगता अनुसार रोजगार या जीविका का साधन नहीं पायेगा तो वह अपनी योग्यता का उपयोग अन्य असमाजिक कार्यों में करेगा|
आज शिक्षा व्यापार का स्वरुप बन गया है| शिक्षा के द्वारा डिग्री मात्र पा लेना ही एक शिक्षित समाज के निर्माण के लिए सही नहीं है| आज नहीं तो कल यह समाज देश के लिए एक गंभीर बीमारी बन सकती है| हमें प्रकृति की रचना का पालन हर जगह की तरह शिक्षा में भी करना होगा| प्रकृति ने जैसे फल, फूल और पेड़ों को एक जैसा और सामान गुणों का नहीं बनाया है जिसमे हम यह देखते है प्रकृति किसी भी पेड़ पर पत्तों, फूलो और फल को एक सिमित मात्रा जितना उस पेड़ की क्षमता से अधिक नहीं लगाने/उगने देती है| जिससे उसकी गुणवत्ता बनी रहे| उसी तरह प्रकृति ने जब ब्यक्ति को एक समान नहीं बनाया है, हर व्यक्ति की अपनी एक पहचान उसके रंग, रूप और शारीरिक संरचना अनुसार भिन्न है तो हम सभी को एक ही तरह और समान शिक्षा सभी को कैसे दे सकते है| हमें विषय विशेष और उच्च शिक्षा की संख्या के निर्धारण उपरान्त ही शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाना होगा| शिक्षा में भी एक संतुलन स्थापित करना ही होगा तभी उसकी गुणवत्ता और उपयोगिता का लाभ समाज देश को प्राप्त हो सकेगा और समाज देश शिक्षा के विकास का सही लाभ पा सकेगा| इस सुझाव के प्रयोग कर हम निश्चित ही एक सफल शिक्षित और विकसित समाज का निर्माण कर संकेगे|



मंगलवार, 20 मार्च 2018

सामजिक चरित्र का निर्माण

सामजिक सफलता के चारित्रिक मंत्र 

       किसी भी समाज के सफल निर्माण और क्रियानावन के लिए समाज के एक उच्च चरित्र का होना अनिवार्य है| सामाजिक चरित्र किसी भी समाज के लिए एक मुख्य अतुलनीय और सुद्रिढ पूँजी है। सामाजिक संरचना के हम सभी सहभागी और प्रतिभागी  है| हमारी ब्यक्तिगत चरित्र ही सामाजिक चरित्र को चरितार्थ करती है अत: सामाजिक चरित्र ही समाज की आधारशिला है। यही वो गुण है जो जन-समाज  में समाज को  सम्मानजनक स्थान दिलाता है। हमरी ब्यक्तिगत चरित्र  ही समाजिक चरित्र का ही पर्यायवाची है। सामाजिक चरित्र के निर्माण के लिए हमारे बहुत से ब्यक्तिगत चीजे समाज के विकास में अनिवर्य है। जिसमे हमारे ब्यक्तिगत संस्कार,शिक्षा और ब्याक्तितव का प्रमुख स्थान है। सामाजिक ज्ञान और शिक्षा चरित्र निर्माण का प्रमुख साधन है वही संस्कार सामाजिक समूह को एक सूत्र में बाधने और संगठित करने का साधन भी है|  सामजिक चरित्र व्यक्तिगत चरित्र पर पूर्ण रूप से  निर्भर है। समाज व्यक्तियों के समूह से मिलकर बना है इसलिए व्यक्ति के प्रत्येक क्रियाकलाप का सीधा प्रभाव समाज पर पड़ता है। व्यक्ति समाज का निर्माता होता है। अतः उसकी अच्छाइयों और बुराइयां दोनों ही समाज के निर्माण में अहम महत्व रखता है| व्यक्ति के चरित्र निर्माण में उसका परिहवेश(रहन-सहन) और स्वभाव का विशेष महत्त्व होता है जबकि स्वभाव का निर्माण संस्कारों से होता है। ये संस्कार ही होते है जो मनुष्य के जीवन को सुखी ,संतोषप्रद और अनुशासित बनाते है। संस्कार निर्माण एक लम्बी प्रक्रिया है जो मनुष्य के को जीवन उपतंत अपने वातावरण खासकर परिवार और आस-पास के वातवरण से शुरू होकर समाज में हो रही गतिविधियों से प्र्राप्त होती है|  यही संस्कार परिमार्जित होकर चरित्र की विशषताओं का रूप धारण करते रहते है। संस्कारों पर परिवेश ,अभ्यास ,आत्मावलोकन एवं स्वम् समाज का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। शिक्षा संस्कारों को सुध्रिंड रूप से एवं सुन्दर व् स्वस्थ बनाने का मुख्य साधन है।
      शिक्षा का अर्थ सिर्फ जीविकापार्जन या नौकरी के लिए नहीं करना अनिवार्य है और नहीं केवल डिग्री प्र्राप्त करने के लिए बल्कि शिक्षा का सही अर्थ अच्छाई और बुराईयों के  ज्ञान के साथ हमें जीवन जीने की कला और साधन भी देता है| सामजिक  ज्ञान और शिक्षा  संस्कार की जननी है, यह मात्र अतिशयोक्ती नहीं है| सामाजिक  शिक्षा एक ऐसा साधन है जिसके माध्यम से मनुष्य ज्ञान द्वारा  अच्छाई और बुराईयों में अंतर के साथ ब्यवहारिक संस्कार और सभ्यता सिखाता है| आवश्यक शिक्षा हमें गुरुकुल (विद्यालय) के गुरुजनों के सानिध्य और ज्ञान से प्राप्त होती है जिससे हमें यही ज्ञान और जीवन के अनुभव संस्कार को बनाने में सहायक होते है|  ब्यक्ति के सामाजिक ज्ञान  और शिक्षा उसके कार्यों एवं सोच का सीधा प्रभाव समाज के निर्माण पर पड़ता है| ऐसे में शिक्षा की भूमिका किसी भी समाज के लिये महत्वपूर्ण होती है| स्वस्थ सामाजिक  शिक्षा व्यक्ति में स्वस्थ संस्कार उत्पन्न करती है। इन्ही संस्कारों से व्यक्तिगत चरित्र का निर्माण होता है, यही चरित्र समाज के लिए सामजिक चरित्र कहलाता है। यही सामजिक शिक्षा है जो व्यक्तिगत चरित्र को सामजिक  चरित्र में बदल देती है। ब्यक्तिगत चरित्र ही समाज में समाहित होकर चरित्र के  परिपक्वता का निर्माण करता है। क्योंकि व्यक्ति स्वम्  में ही समाज को पूर्ण करता है।  

       प्राकृतिक रूप से समय के साथ -साथ सामाजिक जीवन का स्वरुप बदलता रहता है लेकिन समाज  समाज का चरित्र नहीं बदलता है|  समाज के स्वरुप में यह परिवर्तन मूलतः ब्यक्ति के कार्य और आचरण के कारण  प्रभावित करने वाले चीजों  के आधार पर अच्छा या बुरा किसी भी रूप में  ये परिवर्तन हो सकता है।  परिवर्तन व्यक्ति के चरित्र को भी अपने अनुरूप ही प्रभावित करने की क्षमता रखता है। ऐसे में समय के साथ परिवर्तन शिक्षा (अच्छा या बुरा )  ही एक मात्र साधन है जो मनुष्य में विवेक शक्ति उत्पन्न करके उसके नैतिक चरित्र को दृढ़ता प्रदान करती है। मनुष्य के जीवन में शिक्षा की निरंतरता ही समाज समर्पित व्यक्ति का चरित्र निर्माण करने की शक्ति रखती है|  

यह कदापि माने नहीं रखता है कि मनुष्य का वातवरण जैसे वह क्या पहनता है, क्या खता है ,कहाँ रहता है। अत्यधिक महत्त्व पूर्ण तत्व उसका ब्यवहार और आचरण होता है जो उचित माध्यम और सही तरीके से ग्रहण की गयी सामजिक शिक्षा ही है जिसके द्वारा वह अपने  वातावरण को ऊतम और सार्थक बना सकता है| स्वस्थ और अच्छी ज्ञानवर्धक  शिक्षा से ही एक उत्तम और प्रभावशाली चरित्र का निर्माण होता है ,जो ब्यक्तियो के समूह से मिलकर एक  परिवार का निर्माण करता है ,और यही स्वस्थ और सुन्दर परिवार से स्वस्थ और सुन्दर समाज का निर्माण होता है| 

       यह सत्य है कि हर ब्यक्ति  का अपना व्यक्तित्व होता है जो उसे अपने को दूसरों से अलग करता है, वही मनुष्य की पहचान है। । परन्तु मात्र ब्याक्तितव के विभिन्नताओ के कारण मनुष्य एकाकी रहकर कठनाईयों से आसानी से निपट नहीं सकता है और ना सार्वजानिक जीवन में सफल हो सकता है| यही कारण है की सामान विचार धारा और संस्कार को मानने वाले ब्यक्तियो द्वारा अपने अपने अनुसार समाज की निर्माण होता रहता है|
       यह भी सच है की जैसा प्रकृति का यह नियम है कि एक मनुष्य की आकृति व्  रंग-रूप एक दूसरे से भिन्न है। आकृति व्  रंग-रूप का यह जन्मजात भेद यही तक ही सीमित नहीं है यह भेद  उसके स्वभाव, संस्कार और उसकी आदतों में भी वही असमानता रखता है| किसी एक समानता के कारण ब्यक्तियो द्वारा अवश्य ही समाज की स्थापना कर ली जाय परन्तु यदि सभी के चरित्र का निर्माण सुध्रिड नहीं है तो समाज कभी भी एक होकर सफल नहीं हो सकता है| प्रकृति के द्वारा प्रदान इस विभीनातो के गुण ही सृष्टि का सौन्दर्य है। जिस प्रकार प्रकृति हर पल अपने को नये रूप में बदलती रहती है जिसका प्रभाव को हम बिना किसी भेद-भाव को सहर्ष स्वीकार कर लेते है|  हमें अपने सामजिक जीवन में भी होने वाले परिवर्तन को भी समय और परिस्थिति के अनुसार स्वीकार करना चाहिए| कार्य – विचार और सोचने की क्षमता सभी ब्यक्तियो में एक सामान नहीं हो सकती है पर यदि ब्यक्ति का चरित्र उत्तम है तो यह सभी विभिन्नताओ के बावजूद हम सामाजिक जीवन को स्थापित करने में सफल हो सकते है| साथ चलने और एक-दूसरे के सहयोग की भावना के साथ यदि ब्यक्ति में समर्पण का भाव रहे तो सामाजिक जीवन और यापन में कोई भी टकराव या भेद नहीं हो सकता है| ब्यक्ति  के किसी भी एक कार्य करने के शैली या तरीके में अंतर हो सकता है परन्तु यदि उसी कार्य के करने के तरीके बहुत से है तो हम मिलकर एक प्रयास से सबसे अच्छे और सरल तरीके द्वारा आसानी से सफलता प्राप्त कर सकते है|


शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2017

प्यार हंसी और खुशी जीवन के तीन अनमोल पल

प्यार हंसी और खुशी जीवन के तीन अनमोल पल

किसी के भी जीवन के ये तीन अनमोल चीजे है जिसे वह जोर जबरजस्ती नहीं पा या छीन सकता है| हम इसे चाहकर या धनवान बनकर भी खरीद नहीं सकते है या यो कहे कि ये तीन चीजे बिकाऊ नहीं है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी| मानव जीवन को स्वस्थ और निर्मल, निरोग रखने के लिए भी इसकी ही आवश्यकता होती है| यदि हम निरोग और स्वस्थ रहना चाहते है तो इसे हमें जीवन में पाना होगा, अन्यथा हम कभी स्वस्थ नहीं रह संकेंगे| इन तीन चोजो में प्यार वह पल का एहशाश है जिससे हम पाना तो चाहते है पर इसे हम दूसरों में ढूढना चाहते है, जबकि प्यार वह अभिब्यक्ति है जिसे हमें दूसरे में ढूढने की जरुरत नहीं जब कोई सुंदरता का प्रतिक होता है तो हमें चाहत उसे देखने, पाने और छूने की होती है वह किसी भी रूप में हो| प्यार पाने के लिए प्यारा होना पडेगा फिर प्यार  अपने आप मिल जाएगा, आप स्वं सुन्दर लगे चाहे वह मन, तन, या वाणी से हो, सुंदरता हमें अपने व्यक्तित्व, बोलचाल के मृदभाषी, सहयोगी, आपस का सामंजस्य और भावना को छू लेना हो हो तो प्यार आप को मिल ही जाएगा|  जब आप अपने आप से एक बार प्यार करने की आदत बना लेते हो तो फिर दूसरे का प्यार आप को मिलाने से कोई नहीं रोक सकता है| प्यार केवल दो विपरीत लिंगों के बीच  ही नहीं जिसमे केवल सेक्स या शारीरक रूप से आनंद पाना ही प्यार है यह तो एक प्रकिर्ति की दी हुयी एक अनमोल तोहफा हर सामाजिक प्राणी के लिए होती है और यह की प्राय: प्यार की परिभाषा हम उसी रूप में जानते पहचानते है| जिस प्रकार विपरीत लिंग के प्रति हमारा आकर्षण और चाहत उसे एक सुन्दररूप में पपने की होती है ठीक उसी प्रकार से अन्य के प्रति भी तभी आकर्षित और चाहत पा सकते है चाहे उससे हमरा सम्बन्ध किसी भी रूप में हो जब हम सुन्दर बने और दिखे| सच्चा प्यार हमें तब अधिक समझ में आता  है जब हम उससे बिछड़ने और दूर होते है और उसके बिना हमें दर्द या गम का एह्शाश होता है वास्तव में प्यार एक समर्पण का भाव है जिसमे कोई भी अपना या बेगाना लगाने लगे और हमें दुःख का एहसाश लगाने लगे| यदि आप बिना किसी भेदभाव या लालच के एक दूसरे के लिए समर्पित हो तो प्यार होने ही लगता है| दूसरी अनमोल चीज खुशी हमें तभी मिलेगी जब हम प्यार किसी से करने लगते है और वह अच्छा और अपना लगाने लगता है जन्हा प्यार अभिब्यक्ति है ति खुशी वह एह्शाश है जिसे हम शब्दों में लिखा जा सकता है यह मन को शांति और सुख देता है और हमें प्यार में खुशी मिलती है| दूसरे खुशी हम तब महशुश करते है जब हमें किसी कार्य में कड़ी मेहनत और इमानदारी के साथ  सफलता मिलती है  तब हमें सबसे ज्यादा खुशी मिलती है जो प्यार के खुशी भी बड़ी लगती है और यह स्थायी भी रहती है| जब खुशी किसी अन्य को बिना दुख दिए मिले तो वह खुशी अनमोल रहती है| जिस खुशी में आत्म संतोष हो वह ही सच्ची खुशी है| हमें कुशी को किसी तराजू में छोटा या बड़ी कम और ज्यादा से कभी नहीं करनी चाहिए नहीं तो हम बाद में दुखी होना पद सकता है खुशी एक परसपर और निरन्तर की प्रक्रिया है और यह प्राणी को जीवन में जुडता रहता है दुःख के बिना हम खुश का एह्शाश कभी भी नहीं कर सकते है अत: कभी जीवन में दुख आती है तो इसका मतलब है बहुत ही जल्द हमें खुशी भी प्राप्त होने वाली है| इसी कारण कहा गया है की सुख – दुःख जीवन के दो पहलू है जिससे हमें खुशी का एहसास होता है| तीसरी अनमोल चीज हंसी जो आत्म जीवन की सबसे अचूक दवा है जिससे जीवन के सारे दर्द दुःख समाप्त हो जाते है, हँसाने के लिए हमें किसी चीज या किसी व्यक्ति या पैसे की जरुरत नहीं होती है बस हमें वह पल और समय की जरूररत होती है जिसे चाहकर, देखकर, सोचकर या बनकर मिलती है| हँसाने के लिए इजाजत की जरुरत नहीं हमें जब भी हंसी अंदर से लगे खुलकर हँसे चाहे वह पल अपने लिए हो या किसी और के लिए| इसके लिए मन का स्वस्थ और विचार का उत्तम होना जरूरी है हमें किसी के दुःख, अवसर या मजबूरी का मजाक बना कर कभी नहीं हँसना चाहिए क्योकि जो चीजे दूसरों को दुःख दे वह हमें खुशी कैसे दे सकती है| हमें जीवन में हसने केबहुत से अवसर देते है जिसमे सफलता एक है, सफल होने पर हमें स्वं में खुशी के साथ हंसी का एह्शाश देती है| जीवन के कुछ ऐसे पल और परिस्थितिय होती है जो अपने आप ही हंसी दे जाती है कुछ ऐसे सुविचार जीवन में बनते है जो हंसी का भाव देते है| किसी के प्रति दुविचार्य बेबशी पर हमें नहीं हँसना चहिये| हँसाने के लिए अपने अंदर हमें सुवुचार और अभिसिंचित कार्य कल्पना जो हमें हंशी दे लाने चाहिए दूसरे मजाक, दूसरे के प्रति सद्भभाव से कल्पना लाना हमें खुशी देती है| किसी कार्य का अप्रस्चित, आश्चर्य तरीका और जोक की कला, रोमांश के आदर्श तरीके, चहरे के भाव या अन्य माध्यम जिससे किसी को दुःख ना हो को करके भी हम हंसने के पल दूढ   सकते है| हँसाने से मन स्वस्थ और शरीर पुष्ट रहता है| जीवन के सफल जीने के ये तीन अनमोल रत्न ही है जो हमें निरोग रख सकते है| हम इन अनमोल चीजों को देख नहीं सकते है ना इसका मोल कर सकते है बस इसे एक दूसरे को भाव के साथ देकर शेयर कर एहसास कर सकते है| जिस प्रकार अपनी इक्षाओं के लिए भगवान के पास पूजा द्वारा पाना चाहते है, रोगी होने पर डॉक्टर के पास उपचार के लिए जाते है और दुवा आशीर्वाद या दवा से स्वस्थ औत ठीक हो जाते है ठीक उसी प्रकार इन तीन अनमोल प्यार, हंसी और खुशी को अपने संस्कार, सम्मान और कार्यों के समर्पण द्वारा पा सकते है| 

सामाजिक निर्माण में परिवार की भूमिका

सामाजिक निर्माण में परिवार की भूमिका

     हमारा समाज पुरातन काल से ही अत्यन ही संगठित रहा है जहा सामाजिक धार्मिक संस्कारित और परपर सहयोग की भावना समाज के हर वर्ग के परिवार में उसके उत्थान और संरचना में सहायक रही है| यही कारण है कि पुरातन परिवारों में एक जुटता और संयुक्तरूप से साथ जीने – मरने और प्यार-मोहबत कूट-कूट कर भरा रहता था| परिवार के सदस्यों के बीच एक दूसरे के प्रति समर्पण की भावना ही इसका मुख कारण था की परिवार संगठित और सुदृण हूआ करता था, परिवार के मुखिया मुखिया की भूमिका राजा की तरह निस्वार्थ रूप से हर सदस्य के लिए सामान था जो एक बड़ा कारण था की हर सदस्य उसकी इज्जत और आदर का भाव रखता था| संयुक्त परिवार में रहने वाले कभी भी दुःख और कठनाई का अनुभव नहीं करते थे और खुशी के अवसर हमेशा दुगनी रहती थी चाहे वह कोई अवसर हो| संस्युक्त परिवार का मुखिया चाहे वह परुष/महिला कोई भी वह परिवार के हर सुख और दुःख को पहले अपना समझता था और परिवार के हर सदस्य का पूरा ध्यान रखता था परिवार में स्वत्रंतता समान रूप से हुआ करती थी जिसमे कोई भेदभाव नहीं होते थे| परिवार का मुखिया ही  निर्णय के लिए अधिकृत था और उसका निर्णय ही अंतिम होता था| सभी एक साथ थे तो सभी का सुख  दुःख सभी के लिए एक सामान था| इस प्रकार एक परिवार के रूप में जो संस्कार और धर्म बनते थे उसी का पालन परिवार के हर सदस्य के लिए अनिवार्य था|, और परिवार को साथ लेकर चलने के लिए योग्यता अनुसार मुखिया का चुनाव होते रहते थे| 

      इस प्रकार किसी कार्य को संपन्न करने के लिए किसी अन्य की जरुरत परिवार को नहीं होती थी क्योकि आपस में कार्य को बाट कर लेने से सभी को आसानी होती थी, जब हाथ अधिक होते है तो कार्य आसान हो ही जाते है और इस प्रकार परिवार का हर सदस्य अपनी योग्यता और सामर्थ्य के अनुसार परिवार को चलाने में अपनी भूमिका निभाता था, आदर, धर्म और संस्कार हर सदस्य को बाधे रखता था जिसके कारण अंतर का भाव की कम और ज्यादा कार्य या क्षमता परिवार के सदस्य के रूप में कभी प्रशन नहीं थे| लेकिन यह सच है की परिवर्तन युगों के लिए होते है, और आज वह संयुक्त परिवार का दृश्य समाज से ओझिल होता जा रहा है और एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन हो रहा है जिसमे संयुक्त परिवार के कुछ कमी और बुराई आज उसके विनाश का कारण बन रहे है| यह समय की जरुरत बनाती  जा रही है| पहले समाज में जनसंख्या और आबादी कम थी, चीजे आसानी से प्राप्त थी, सुविधा की जरुरत कम थी, यदि परिवार का एक सदस्य भी कमाता था तो परिवार की जरुरत पूरी आर लेता था, हम प्रकिर्ति के नजदीक थे और उसी पर निर्भर रहते थे, जरुरत के अनुसार आज हमें वह समय अब बदलने को मजबूर कर रहा है| आज का संयुक्त परिवार एक पीढ़ी पिता-पुत्र का ही देखने को मिल रहा है और भविष्य में परिवार पति -पत्नी या एकल भी हो सकता है जिस तेजी से हम बदल रहे है, ठीक उसी प्रकार से हमारे संस्कार भी बदल रहे है हम आज की पीढ़ी में १-२ पीढ़ी के सदस्यों को पहचान भी नहीं रहे है, और यह भी सच होगा की पिता – पुत्र  को भी ना पहचाने इसमे कोई अनोखी नहीं है| जिस तेजी से परिवार का विघटन हुआ उससे कही ज्यादा तेजी से हमारे संस्कार विघटित हो रहे है इसका एक उदाहरण है कि पहले लोग एक दूसरे सदस्य को आमने – सामने से मिलकर श्रधा और भाव के साथ गले मिलते थे या पैर छू कर आशीर्वाद लेते थे महिलाये तो खासकर गले मिलकर भाव-विभोर होने के साथ प्यार – गम के आंशु तक निकल जाती थे वह इस लिए की कही वो एक दूसरे से कभी बिछुड  ना जाय या फिर कब मिले| 

      प्यार और स्नेह का भाव दिलो में थे लोग समर्पण का भाव एक दूसरे के लिए रखते थे परन्तु आज क्या है हम धीरे धीरे उस श्रधा  भाव को भूलते जा रहे है आज श्रधा का भाव हेल्लो कह कर पूरा होने लगे है तथा लोग आशीर्वाद के नाम पर सर ही हिला देते है| यह भी सच है की समय की मांग अनुसार मनुष्य ने अपने जीवन-यापन को बदलने को मजबूर किया है, अब किसी भी संयुक्त परिवार को एक अकेला व्यक्ति नहीं चला सकता,  साधन और अवश्यकताए बढती जा रही है, जिसे पूरा करने में मनुष्य का सारा समय निकल जता है, साधन ने लोगो के बीच दुरिया बढ़ा दी है मनुष्य अपनी या परिवार  की जरुरत पूरी करने के लिए परिवार से दूर होता  जा रहा है ऐसे में संयुक्त परिवार का महत्त्व समाप्त होने लगे है| संयुक्त परिवार के इसी विघटन के नाते आज समाज में अनेक प्रकार के बुराई और भ्रष्टाचार फ़ैल रहे है| इन सभी में जो सबसे बड़ी चीज विघटन का कारन है एक दूसरे के प्रति इर्ष्या , अहंकार और सा असंतोष परिवार के साथ साथ समाज और देश के लिए घातक हो रहा है| मनुष्य समय के इस परिवर्तन में अपने आप को इतने तेजी से बदलना छह रहा की उसे दूसरे की परवाह नहीं कि उसके स्वंम फायदे के लिए किसी अन्य का नुकशान हो रहा है| और इस सब में दूसरा जो कारण है वो परिवारां में असफलता का मिलना जिसे मनुष्य अपने  को दोषी ना मानते हुए इसके लिए अन्य को दोषी समझता है और फिर दूसरे अवगुण जैसे इर्ष्या, कलह, और हीन भावना का जन्म होते जा रहा है और हम और तेजी से विघटन की ओर जा रहे है| इसके साथ उंच-नीच का भाव और एक दूसरे को नीच्गा दिखाना, दूसरों के सफलता असे इर्ष्या करना और असफलता पर खुशी मनाना आपसी घमंड और कलह ने सनुक्त परिवार को बिखराव के तरफ ले जा रहा है|

      इस संभी के लिए हमारी सांसारिक शिक्षा और संस्कार में कमी ही मुख्या कारण है, हमारे परिवार तो तेजी से शिक्षित हो रहे है पान्तु उतने ही तेजी से हमारे संस्कार में कमी हो रही है| इन सभी के लिए नहं और आप कही ना कही से जिमेद्दर है क्योकि तेजी से आगे बढ़ाने की छह में अपने –पराया के अंतर को बढ़ावा दे रहे है परिवार को अपने तक ही समझ रहे है तो फिर हम दूसरों से कैसे अछे का उम्मीद कर सकते है, ताली तो दोनों हाथ के बजाने से बजेगी, हम जबतक एक दूसरे के शुख-दुःख व् सफलता – असफलता के लिए एक साथ नही निभेंगे तबतक हम सामाजिक विकास न तो अपना कर सकते है ना ही समाज का| ऐसे में किसी देश समाज और परिवार में कैसे खुशहाली और सुख की कामना कैसे  कर सकते है| और जब तक हम खुश और सुख नहीं रहंगे  तबतक ना तो परिवार का निर्माण कर सकते है ना हे समाज का| स्वस्थ परिवार के साथ ही एक स्वस्थ समाज का निर्माण हो सकता है| समाज के विघटन एक और बड़ा कारन हमारी अशिक्षा और आर्थिक तगी भी है, यह बहुत हद तक सच भी है क्योकि हमारा समाज अन्य समाज से अताधिक पिछडा और गरीब रहा है हम अपने रूढवादी परम्परा और कार्य को बदलना नहीं चाहते थे और नाही अपना निवास स्थान और व्यपार जिसके कारण समय ने हमें काफी पीछे कर दिया. हमने समय के अनुसार शिक्षा के महत्व को भी नहीं समझा और जब तक यह बात समझ आती देर हो चकी थी| पर अब पछताने से कुछ नहीं हो सकता है यह भी सच है हमने अब बदलने की चाह कर ली है आज नहीं तो कल हमें इसमे सफलता अवश्य मिलेगी बस सब्र से हमें धीरे धीरे आगे की ओर बढ़ाते रहना है और उस ऊँचाई को भी अवश्य पाना है जिसके लिए हम संकल्पित  है| हमें अपने धार्मिक, संस्कार और परस्पर आपसी प्रेम-समर्पण की भावना के साथ संयुक्त परिवार के अछाईयो  को ग्रहण करते हुए पहले एक स्वस्थ परिवार का निर्माण करना होगा तभी हम एक स्वस्थ समाज की कल्पना कर सकते है| किसी भी परिवार में संबंधो का सामंजस्य एक दूसरे के प्रति आदर भाव, और सबसे बड़ा समर्पण जो प्रेम का भाव देता है वह  एक आदर्श परिवार स्थापित कर सकता है और फिर  एक आदर्श समाज और राष्ट का निर्माण हम कर सकते  है|
#परिवार
#सामाजिक


सोमवार, 14 मार्च 2016

समपर्ण ही प्यार है



समपर्ण ही प्यार है
समाज का हर सामाजिक प्राणी जिसमे जीवन है वह प्यार करना और पाना चाहता है| यह एक प्रकीर्तिक देन है मनुष्य तो इसके भाव से कही ना कही अभी प्रभावित होता ही रहता है परन्तु यह प्यार मानव जीवन में कई रूपों में हमें मिलता है| जो मानव जीवन के समय, अवष्था और सोंच पर निर्भर करता है| हम इसे जोर जबरजस्ती से ना तो इसे पा सकते है ना कर सकते है| मानव जीवन प्यार के बिना सदैव ही अधूरा और उदास रहता है इसी कारण से जब हम किसी आकर्षित किये जाने वाले चोजो या विपरीत लिंग को देखते है तो हमें प्यार की अनुभूती होने लगती है| प्यार की शुरुवात मानव जीवन में बचपन से ही शरू होकर पुदापे तक बने रहती है बस इसके रूप स्वरुप में परिवर्तन होते रहते है| प्यार के बीच भाव और समर्पण का होना अतिआवश्यक है इसके बिना प्यार अस्थायी और अधूरा या यो कहे स्वार्थ में होता है| जब हम बचपन के दौर से गुजरते है तो यह एक माँ के भाव और समर्पण का ही परिणाम है की वह अपने बच्चे से या बच्चा अपने माँ से प्यार करने लगता है, इसी प्रकार जब हम अलग अलग प्रस्थितियो में अलग अलग भाव के साथ एक दूसरे के प्रति जैसा भाव-समर्पण रखते है हमें वैसा ही अनुभूति प्यार के रूप में होने लगती है| दो विपरीत लिंगों के बीच का भी प्यार भाव के कारण ही होता है पर जब इसमे समर्पण जुड जाती है तो वन एक स्थायी प्यार का रूप ले लेती है| हम मानव जीवन में प्यार के कई रूप देख सकते है जिसमे माँ-बच्चे, पिता-पुत्र, भाई-बहन और पति-पत्नी का है| हम हर अवस्था में भाव के साथ यदि समर्पण रखते है तभी प्यार स्थयी होने के साथ बना रह सकता है| किसी भी स्वार्थ और गलत भाव के साथ किया गया प्यार कभी  भी सताए और फलीभूत नहीं हो सकता है| प्यार हमें मानव जीवन को एक डोर से बंधे राकहने एक अहम भूमिका निभाती है जिससे हमारा परिवार ही नहीं, समाज और देश के प्रति भी प्यार देशभक्ति के रूप में प्रकट होती है| समर्पण के बिना हम कभी भी किसी से प्यार नहीं कर सकते है और ना ही हमें प्यार मिल सकता है| समर्पण वह भाव है जो हम मानव को एक सेतु से जोड़े रहता है, प्यार वह एह्शाश है जिसमे हम उस प्राणी या वास्तु से बिछडने या खोने मात्र से दुःख का अनुभूति होती है| शायद इसी दुःख या गम को हम एक सच्चा प्यार कह सकते है| हम प्यार को बड़ी ही आसानी से अनुभव कर सकते है की जब हम किसी चीज को पसंद करने लगते है और जब वह चीज हमसे दूर हो जाती है या गम हो जाती है तो दुःख का एहसास होता है| प्यार के अनुभाव में स्वार्थ का कोई स्थान नहीं है हम प्यार के डोर से तबतक बंधे रहते है जबतक स्वार्थ जैसी कोई चीज इसके बीच नहीं आती है| समर्पण क्या है यह अवश्य ही परिभाषित होनी चाहिए, अन्य चीजों के तरह ही समर्पण वह भाव या अनुभूती है जिसमे हम एक संस्कार के साथ धर्म का पालन करते हुए एक दूसरे के प्रति अपना विशवास रखते है उसके शुख-दुःख सहित अन्य अवसरों में एक दूसरे के साथ सहयोग करते है| जैसा की माँ अपने नवजात पुत्र को लालन-पालन से लेकर उसके भलन-पोषण में करती है और यही धार्मिक-संस्कारित भाव का समर्पण माँ और बच्चे के बीच प्यार के रूप में अनुभूति देने लगता है| यह एहसास माँ हर दम करती रहती है जैसे ही उसके बच्चे को कोई दुःख-कष्ट होता है प्यार उसके चहरे पर दुःख के रूप में ही प्रदर्शित होने लगता है| यह उसी समर्पण के कारण ही होता है जो एक माँ उसे बिना अपने जीवन के सुखो का प्रवाह किये उसके लालन-पालन में लगाती है| प्यार केवल दो विपरीत लिंग के मानव में ही नहीं होता है यह हर मानव को एक दूसरे के बीच हो सकता है यदि समर्पण का भाव हममे हो जाय| दो विपरीत लिंगों के बीच का आकर्षण और मन: इक्षा मात्र से प्यार संभव नहीं है इअसमे भी समर्पण का भाव होना जरूरी है तभी यह सफल होता है| एक सच्चा प्यार तभी अमर होता है जब उसमे समर्पण हो जैसा की हम सभी जानते है ताजमहल उसी समर्पण का रूप है जो ना रहते हुए भी उसे ज़िंदा राकहने के लिए इस रूप में बनी है और सभी के लिए एक मिशाल है|हम जब अपनो से प्यार करंगे, तो परिवार से प्यार होगा और फिर वह एक सामाज के लिए भी प्यार बनेगा| और यही प्यार हम देश के लिए भी कर सकते है जब हम एक राष्ट्भाव और देशभक्ति के साथ देश के लिए कुछ समर्पण करे जिसका रूप देश के विकास और देश की आन-बाण और सुरक्षा से जुदा होगा जिसमे हमारा योगदान होगा तो हमें स्वत: ही राष्ट प्रेम हो सकेगा|

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

प्यार हंसी और खुशी जीवन के तीन अनमोल पल



प्यार हंसी और खुशी जीवन के तीन अनमोल पल
किसी के भी जीवन के ये तीन अनमोल चीजे है जिसे वह जोर जबरजस्ती नहीं पा या छीन सकता है| हम इसे चाहकर या धनवान बनकर भी खरीद नहीं सकते है या यो कहे कि ये तीन चीजे बिकाऊ नहीं है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी| मानव जीवन को स्वस्थ और निर्मल, निरोग रखने के लिए भी इसकी ही आवश्यकता होती है| यदि हम निरोग और स्वस्थ रहना चाहते है तो इसे हमें जीवन में पाना होगा, अन्यथा हम कभी स्वस्थ नहीं रह संकेंगे| इन तीन चोजो में प्यार वह पल का एहशाश है जिससे हम पाना तो चाहते है पर इसे हम दूसरों में ढूढना चाहते है, जबकि प्यार वह अभिब्यक्ति है जिसे हमें दूसरे में ढूढने की जरुरत नहीं जब कोई सुंदरता का प्रतिक होता है तो हमें चाहत उसे देखने, पाने और छूने की होती है वह किसी भी रूप में हो| प्यार पाने के लिए प्यारा होना पडेगा फिर प्यार  अपने आप मिल जाएगा, आप स्वं सुन्दर लगे चाहे वह मन, तन, या वाणी से हो, सुंदरता हमें अपने व्यक्तित्व, बोलचाल के मृदभाषी, सहयोगी, आपस का सामंजस्य और भावना को छू लेना हो हो तो प्यार आप को मिल ही जाएगा|  जब आप अपने आप से एक बार प्यार करने की आदत बना लेते हो तो फिर दूसरे का प्यार आप को मिलाने से कोई नहीं रोक सकता है| प्यार केवल दो विपरीत लिंगों के बीच  ही नहीं जिसमे केवल सेक्स या शारीरक रूप से आनंद पाना ही प्यार है यह तो एक प्रकिर्ति की दी हुयी एक अनमोल तोहफा हर सामाजिक प्राणी के लिए होती है और यह की प्राय: प्यार की परिभाषा हम उसी रूप में जानते पहचानते है| जिस प्रकार विपरीत लिंग के प्रति हमारा आकर्षण और चाहत उसे एक सुन्दररूप में पपने की होती है ठीक उसी प्रकार से अन्य के प्रति भी तभी आकर्षित और चाहत पा सकते है चाहे उससे हमरा सम्बन्ध किसी भी रूप में हो जब हम सुन्दर बने और दिखे| सच्चा प्यार हमें तब अधिक समझ में आता  है जब हम उससे बिछड़ने और दूर होते है और उसके बिना हमें दर्द या गम का एह्शाश होता है वास्तव में प्यार एक समर्पण का भाव है जिसमे कोई भी अपना या बेगाना लगाने लगे और हमें दुःख का एहसाश लगाने लगे| यदि आप बिना किसी भेदभाव या लालच के एक दूसरे के लिए समर्पित हो तो प्यार होने ही लगता है| दूसरी अनमोल चीज खुशी हमें तभी मिलेगी जब हम प्यार किसी से करने लगते है और वह अच्छा और अपना लगाने लगता है जन्हा प्यार अभिब्यक्ति है ति खुशी वह एह्शाश है जिसे हम शब्दों में लिखा जा सकता है यह मन को शांति और सुख देता है और हमें प्यार में खुशी मिलती है| दूसरे खुशी हम तब महशुश करते है जब हमें किसी कार्य में कड़ी मेहनत और इमानदारी के साथ  सफलता मिलती है  तब हमें सबसे ज्यादा खुशी मिलती है जो प्यार के खुशी भी बड़ी लगती है और यह स्थायी भी रहती है| जब खुशी किसी अन्य को बिना दुख दिए मिले तो वह खुशी अनमोल रहती है| जिस खुशी में आत्म संतोष हो वह ही सच्ची खुशी है| हमें कुशी को किसी तराजू में छोटा या बड़ी कम और ज्यादा से कभी नहीं करनी चाहिए नहीं तो हम बाद में दुखी होना पद सकता है खुशी एक परसपर और निरन्तर की प्रक्रिया है और यह प्राणी को जीवन में जुडता रहता है दुःख के बिना हम खुश का एह्शाश कभी भी नहीं कर सकते है अत: कभी जीवन में दुख आती है तो इसका मतलब है बहुत ही जल्द हमें खुशी भी प्राप्त होने वाली है| इसी कारण कहा गया है की सुख – दुःख जीवन के दो पहलू है जिससे हमें खुशी का एहसास होता है| तीसरी अनमोल चीज हंसी जो आत्म जीवन की सबसे अचूक दवा है जिससे जीवन के सारे दर्द दुःख समाप्त हो जाते है, हँसाने के लिए हमें किसी चीज या किसी व्यक्ति या पैसे की जरुरत नहीं होती है बस हमें वह पल और समय की जरूररत होती है जिसे चाहकर, देखकर, सोचकर या बनकर मिलती है| हँसाने के लिए इजाजत की जरुरत नहीं हमें जब भी हंसी अंदर से लगे खुलकर हँसे चाहे वह पल अपने लिए हो या किसी और के लिए| इसके लिए मन का स्वस्थ और विचार का उत्तम होना जरूरी है हमें किसी के दुःख, अवसर या मजबूरी का मजाक बना कर कभी नहीं हँसना चाहिए क्योकि जो चीजे दूसरों को दुःख दे वह हमें खुशी कैसे दे सकती है| हमें जीवन में हसने केबहुत से अवसर देते है जिसमे सफलता एक है, सफल होने पर हमें स्वं में खुशी के साथ हंसी का एह्शाश देती है| जीवन के कुछ ऐसे पल और परिस्थितिय होती है जो अपने आप ही हंसी दे जाती है कुछ ऐसे सुविचार जीवन में बनते है जो हंसी का भाव देते है| किसी के प्रति दुविचार्य बेबशी पर हमें नहीं हँसना चहिये| हँसाने के लिए अपने अंदर हमें सुवुचार और अभिसिंचित कार्य कल्पना जो हमें हंशी दे लाने चाहिए दूसरे मजाक, दूसरे के प्रति सद्भभाव से कल्पना लाना हमें खुशी देती है| किसी कार्य का अप्रस्चित, आश्चर्य तरीका और जोक की कला, रोमांश के आदर्श तरीके, चहरे के भाव या अन्य माध्यम जिससे किसी को दुःख ना हो को करके भी हम हंसने के पल दूढ   सकते है| हँसाने से मन स्वस्थ और शरीर पुष्ट रहता है| जीवन के सफल जीने के ये तीन अनमोल रत्न ही है जो हमें निरोग रख सकते है| हम इन अनमोल चीजों को देख नहीं सकते है ना इसका मोल कर सकते है बस इसे एक दूसरे को भाव के साथ देकर शेयर कर एहसास कर सकते है| जिस प्रकार अपनी इक्षाओं के लिए भगवान के पास पूजा द्वारा पाना चाहते है, रोगी होने पर डॉक्टर के पास उपचार के लिए जाते है और दुवा आशीर्वाद या दवा से स्वस्थ औत ठीक हो जाते है ठीक उसी प्रकार इन तीन अनमोल प्यार, हंसी और खुशी को अपने संस्कार, सम्मान और कार्यों के समर्पण द्वारा पा सकते है|

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

स्वच्क्षता अभियान की बाधाए

आज पुरा  देश स्वच्छता की बात कर रहा है जोकि कोई नयी बात नहीं है हम सभी जब छोटे थे तो हमारे गुरुजन और अभिवावक हमें इसे एक संस्कार की तरह पालन करने की शिक्षा दिया करते थे| जिसमे ना केवल साफ़ सफाई या स्वच्छ रहने की बात सिखाई जाती ठी बल्कि हमें समाज में कैसे उठना, बैठना, चलना और व्यवहार करना है सिखाया जाता था जोकि हमारे जीवन की पहली शिक्षा होती थी और उसके द्वारा हम सामाजिक जीवन शैली और जीने की सबक/कला पाते थे| इस प्रकार हम अपने जीवन के दैनिक क्रिया - कर्म के साथ आज जीवन चला रहे है| आज समाज में इन्ही संस्कारों की कमी होती जा रही है जिससे आज अलग से हमें स्वच्क्षता के लिए प्रयास करने की जरुरत हो रही है| साफ़ – सफाई का यह क्रम नया नहीं है अगर नया कुछ है तो वह हमाँरी सोच, उसके क्रियान्वन की समग्र भूमिका और व्याहारिक अभाव  और उसमे आया बदलाव| आज इस बात को जब समाज का एक मुखिया कह रहा है तो यह और भी प्रसंगिक हो जाता है| आज के इस आधुनिक बदलते दौर में स्व्च्क्ष्ता, साफ़-सफाई में बहुत सी बाधाए है जिसे इतनी आसानी से सफल कर पाना बहुत मिश्किल है| समय के साथ साथ परिवार समाज में कई दुरिया और बढ़ाये  बनती गयी है जिससे यह काम और भी कठिन लगता है, सामजिक भेदभाव और कार्य करने के शैली कि यह कार्य एक विशेष संमुदाय/वर्ग द्वारा ही किया जाएगा और उसकी एक श्रेणी का विभाजन कर देना भी एक बाधा बनी| सरकारी सामाजिक प्रितीष्ठानो आदि में इसे बढ़ावा पैसा देकर कराने और नौकरी द्वारा ही करने के प्रक्रिया ने भी कम बाधित नहीं किया है| साफ़-सफाई, स्वच्क्षता जोकि सामजिक जीवन सैली  का मूल आधार है, वह व्यासायिक  व् अव्य्हारिक हो रहा है जिससे हम अपनी कर्म से अलग समझाने लगे| आज जब इसका परिणाम हमें दिखाई देने लगा है कि यह तो आने वाले समय में एक विशाल समस्या का रूप ले लेगा जिससे गंदगी और दुर्व्य्स्था  फैलेगी बलिक हमारा स्वास्थ  भी अनेक रोगों और बीमारियों से प्रभावित होगा तब जाकर सामजिक संगठनो व् सरकार ने इसे गंभीर रूप से लिया और अब हमें एक “स्वचक्ष-क्रन्ति”  की आवश्यकता है जोकि गावों, कस्बो, शहरों से लेकर महानगर देश-प्रदेश में एक अभियान के रूप में चलाना होगा| गाव कस्बो में तो अभी भी घर की स्त्रिया अपने घर-द्वार की साफ़ सफाई करती रहती है और पुरुष भी इस कार्य में अपना योगदान देते है इन जगहों पर इस कार्य को आसानी से कर सकते है क्योकि इन  जगहों पर अभी यह स्व्च्क्ष्ता का कार्य ज़िंदा रहते हुए अंतिम सासे ले रहा है परन्तु सबसे बड़ी बाधा नगरों और महानगरों में होगी जन्हा यह लगभग  मृत्यु हो गया है, लोगो को अपने घर की साफ़ सफाई के लिए ना तो समय है नहीं वह इसे सामाजिक रूप से मानते है किसी तरह किराये के लोगो द्वारा कार्य कर जीवन यापन कर रहे है| दुसरा बड़ा कारण नगरों, महानगरों की सामजिक व्यवस्था जिसमे घर के बनावट से लेकर गलियों, नालियों, सडको और सार्वजनिक जगहों के निर्माण का कोई रूप रेखा नियम और क़ानून व्याहारिक नहीं है, जो भी नियम क़ानून बने है वह केवल कागजो के लिए बने है| जो की इस कार्य में एक बड़ी बढ़ा बने हुए है|  हमें यदि इस स्वचक्ष-क्रन्ति को व्याहारिक रूप से चलना है तो इन बाधाओ को दूर करना होगा कुछ सख्त क़ानून या तो बनाने होंगे या फिर बने कानूनों को सख्ती से पालन करना होगा| इसके पहले सरकार/समाज को एक सुद्रिड इन्फ्रासटकचर देना होगा जिसमे कूड़ा के निस्तारण, जल निकासी के साधन, गलियों और सडको का समुचित रख रखाव व् निर्माण तथा नियमों को सख्ती के साथ पालन करना समलित है, तभी हम इस स्व्च्क्षता के अभियान को असली रूप दे सकेंगे| पुरातन समय में स्व्च्क्षता जीवन का एक अभिप्राय था जो इस आधुनिक युग में एक समस्या बन गयी है जिसमे सामाजिक और आर्थिक समस्या के साथ साथ शिक्षा भी एक बाधा है| हमारी शिक्षा और संस्कार हमें इस स्वच्क्षता से दूर कर दिया है, शुम सभी जानते है कि स्व्च्कश्ता से ही स्वास्थ्य बनेगा और स्वस्थ व्यक्ति में ही बुधि- चिंतन  का विकास होगा  तभी एक स्वस्थ – शशक्त समाज का निर्माण होगा| आज हम सभी चाहते है की हमारा बच्चा इंग्लिश माध्यम से शिक्षा ग्रहण करे और सामाजिक आर्थिक रूप से आगे बढे परन्तु ऐसे में वह    केवल शिक्षा तो शायद ले रहा पर उसमे ज्ञान और संस्कार का अभाव रह जा रहा है जोकि सामाजिक जीवन शैली के लिए बहुत जरूरी है अत: हमें प्राइमरी शिक्षा से लेकर स्नातक शिक्षा तक स्व्च्क्षता-संस्कार का एक विषय भी अनिवार्य रूप से पढाने के लिए प्रयोजन बनाना होगा नहीं तो सफाई के अलावा भी बहुत सी संस्कारिक मूल्यों के कमी से और बहुत सी चीजे आने वाले समय में सामाजिक समस्या बन सकती है| हालकि स्नातक स्तर पर एन०  एन०  एस० और एन० एन० सी० जैसी संस्थाए इस कार्य में अपना योगदान देती है पर यह पर्याप्त नहीं है इस दिशा में और भी कार्य किये जाने की जरूररत है| हम केवल भाषण और प्रतिकात्म्क रूप से इस कार्य को पूरा नहीं करा सकते है, इसे एक जन आन्दोलन के रूप में निरंतरता के साथ करना होगा, इस कार्य में छोटा- बड़ा, उच्च -नीच का भेद- भाव भी हटाना होगा, यह दायित्व केवल कुछ सिमित और प्रसंगिक लोगो द्वारा ही नहीं होगा इसमे छोटे बड़े सभी लोगो चाहे वह कितने बड़े पद पर अधिकारी हो या  राजनेता सभी को सामान रूप से भागीदार बनाना होगा| इसके साथ ही सरकार और सामजिक संगठनों को साफ़-सफाई के साथ एक सुन्दर और आकर्षण माडल विकसित कर लोगो को दिखाना होगा ताकि उसका अनुसरण कर वह समाज में स्वचक्षता के महत्व को समझ सके और उसे ग्रहण कर सके| जब ऐसे विकसित स्थान जो दिखने में एक धार्मिक स्थान की तरह से लगेगे तो उस स्थान को किसी भी व्यक्ति में गंदगी करने की साहस नहीं रहेगी बल्कि उसकी स्वच्क्षता और सुंदरता देखकर वह उसे भी स्वचक्ष रखने में अपना योगदान देगा|